क्या एक मसीही व्यक्ति मदिरायुक्त दाखमधु पी सकता है? एक बाइबिलीय दृष्टिकोण

क्या एक मसीही व्यक्ति मदिरायुक्त दाखमधु पी सकता है? एक बाइबिलीय दृष्टिकोण

दाखमधु, मसीही स्वतंत्रता, पवित्रता और आत्मिक उत्तरदायित्व का व्याख्यात्मक एवं धर्मवैज्ञानिक अध्ययन

सारांश (Abstract)

क्या मसीही विश्वासियों को मदिरायुक्त दाखमधु का सेवन करना चाहिए? यह प्रश्न कलीसिया के इतिहास में लंबे समय से धर्मवैज्ञानिक चर्चाओं और मतभेदों का विषय रहा है। कुछ लोग मानते हैं कि बाइबल मदिरा पीने को नहीं, बल्कि नशे में धुत होने को निषिद्ध करती है; इसलिए सीमित मात्रा में मदिरा का सेवन स्वीकार्य है। इसके विपरीत, कुछ अन्य लोग तर्क देते हैं कि बाइबल की पवित्रता, आत्मसंयम और मसीही उत्तरदायित्व संबंधी शिक्षाओं के अनुरूप पूर्ण मद्यत्याग ही सबसे उचित आचरण है। इस मतभेद का एक प्रमुख कारण बाइबिलीय शब्दावली की अलग-अलग व्याख्याएँ हैं, विशेषकर इब्रानी शब्द यायिन (Yayin) और तीरोश (Tirosh) तथा यूनानी शब्द ओइनोस (Oinos) का अर्थ। इसके अतिरिक्त, यूहन्ना 2:1–11, मत्ती 26:26–29, इफिसियों 5:18, रोमियों 14:21 और 1 तीमुथियुस 5:23 जैसे महत्वपूर्ण बाइबिलीय अंशों की व्याख्या भी इस चर्चा में निर्णायक भूमिका निभाती है।

सामुएल बक्कियोकी की पुस्तक Wine in the Bible: A Biblical Study on the Use of Alcoholic Beverages में प्रस्तुत तर्कों को विशेष रूप से ध्यान में रखते हुए, यह लेख भाषायी, ऐतिहासिक, व्याख्यात्मक और धर्मवैज्ञानिक दृष्टिकोणों से मदिरापान के विषय में बाइबल की शिक्षाओं का अध्ययन करता है। इसमें पवित्रशास्त्र में दाखमधु के सकारात्मक और नकारात्मक उल्लेखों के बीच दिखाई देने वाले विरोधाभास, यीशु मसीह का उदाहरण, प्रेरितों की संयम संबंधी शिक्षा तथा मसीही स्वतंत्रता और दूसरों के प्रति उत्तरदायित्व के संबंध का विश्लेषण किया गया है। यह लेख स्वीकार करता है कि बाइबल स्पष्ट रूप से मतवालेपन को निषिद्ध करती है, लेकिन यह दावा करना कि पवित्रशास्त्र हर परिस्थिति में मदिरा के किसी भी प्रकार के सेवन पर सार्वभौमिक प्रतिबंध लगाता है, एक अलग और अधिक सावधानीपूर्वक व्याख्यात्मक जाँच की माँग करता है। फिर भी, पवित्रता, आत्मसंयम, आत्मिक सतर्कता और दूसरों के प्रति प्रेम से संबंधित बाइबिलीय सिद्धांतों का समग्र प्रभाव पूर्ण मद्यत्याग को शिष्यत्व की एक विवेकपूर्ण और उत्तरदायित्वपूर्ण अभिव्यक्ति के रूप में अपनाने के लिए पर्याप्त आधार प्रदान करता है। विशेष रूप से, यह लेख इस बात पर बल देता है कि पास्टरों और कलीसिया के अगुवों को, जिन्हें परमेश्वर के लोगों की आत्मिक देखभाल सौंपी गई है, अपने जीवन में अनुकरणीय अनुशासन और आत्मसंयम प्रदर्शित करना चाहिए।

मुख्य शब्द: मदिरायुक्त दाखमधु, बाइबल में दाखमधु, यायिन, ओइनोस, मतवालापन, मसीही स्वतंत्रता, पवित्रता, मद्यत्याग, आत्मसंयम, मसीही नैतिकता।

1. प्रस्तावना: केवल अनुमति का प्रश्न नहीं

मसीही समुदाय में मदिरा के सेवन का विषय उन विषयों में से एक है जिन पर सबसे अधिक मतभेद देखने को मिलते हैं। विशेष रूप से इवेंजेलिकल और पेंटेकोस्टल परंपराओं में कुछ लोग मदिरापान को मसीही पवित्रता के बिल्कुल विपरीत मानते हैं, जबकि अन्य लोग यह तर्क देते हैं कि पवित्रशास्त्र सीमित मात्रा में मदिरा पीने को नहीं, बल्कि मतवालेपन को दोषी ठहराता है। ये अलग-अलग धारणाएँ केवल सांस्कृतिक परंपराओं या व्यक्तिगत पसंद पर आधारित नहीं हैं, बल्कि बाइबल के विभिन्न अंशों की व्याख्या और मसीही स्वतंत्रता की धर्मवैज्ञानिक समझ से भी जुड़ी हुई हैं।

सीमित मात्रा में मदिरापान का समर्थन करने वाले सामान्यतः यह तर्क देते हैं कि बाइबल दाखमधु पीने को अपने आप में निषिद्ध नहीं करती, बल्कि मतवालेपन और उसके विनाशकारी परिणामों की निंदा करती है। वे विशेष रूप से काना के विवाह में यीशु द्वारा पानी को दाखमधु में बदलने की घटना (यूह. 2:1–11), पौलुस द्वारा तीमुथियुस को उसके पेट की बीमारी के कारण थोड़ा दाखमधु लेने की सलाह (1 तीमु. 5:23), और पुराने नियम में दाखमधु को परमेश्वर की आशीष के रूप में प्रस्तुत करने वाले अंशों (भज. 104:14–15) का उल्लेख करते हैं। उनके अनुसार, यदि मदिरापान मतवालेपन, लत या गैर-जिम्मेदार व्यवहार की ओर नहीं ले जाता, तो सीमित मात्रा में उसका सेवन स्वीकार्य है।

इसके विपरीत, पूर्ण मद्यत्याग का समर्थन करने वाले इस धारणा को चुनौती देते हैं कि बाइबल में दाखमधु के प्रत्येक उल्लेख का अर्थ अनिवार्य रूप से मदिरायुक्त पेय ही है। उनका तर्क है कि बाइबिलीय शब्दावली में दाखमधु से संबंधित विभिन्न प्रकार के उत्पाद शामिल हो सकते हैं, जिनमें किण्वित मदिरा के साथ-साथ बिना किण्वित अंगूर का रस भी सम्मिलित है। इसलिए दाखमधु के सकारात्मक उल्लेखों को स्वतः ही मदिरापान की ईश्वरीय स्वीकृति नहीं माना जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, वे मतवालेपन के विरुद्ध बाइबल की बार-बार दी गई चेतावनियों, आत्मसंयम और आत्मिक सतर्कता के महत्व तथा दूसरों को हानि पहुँचाने वाले व्यवहार से दूर रहने के मसीही उत्तरदायित्व पर बल देते हैं।

सामुएल बक्कियोकी अपनी पुस्तक Wine in the Bible: A Biblical Study on the Use of Alcoholic Beverages में दूसरे दृष्टिकोण को विस्तार से प्रस्तुत करते हैं। वे इब्रानी और यूनानी शब्दावली, प्राचीन काल में अंगूर के रस को सुरक्षित रखने की विधियों, यीशु के जीवन और प्रेरितों की शिक्षाओं का अध्ययन करके यह तर्क देते हैं कि बाइबल पूर्ण मद्यत्याग का समर्थन करती है।

फिर भी, इस विषय का अकादमिक अध्ययन करते समय तीन बातों के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना आवश्यक है: पवित्रशास्त्र स्पष्ट रूप से क्या आज्ञा देता है, उसकी शब्दावली किन अर्थों की अनुमति देती है, और व्यापक बाइबिलीय सिद्धांतों से कौन-से धर्मवैज्ञानिक निष्कर्ष निकाले जाते हैं। केवल यह स्थापित कर देना पर्याप्त नहीं है कि मतवालापन पाप है और यह मान लेना कि मदिरापान से संबंधित सभी प्रश्नों का समाधान हो गया। इसी प्रकार, यह सिद्ध कर देना भी पर्याप्त नहीं है कि प्राचीन समाज में दाखमधु का सेवन किया जाता था और इससे यह निष्कर्ष निकाल लेना कि मसीहियों को मदिरापान की असीमित स्वतंत्रता प्राप्त है।

इसलिए मुख्य प्रश्न केवल यह नहीं है कि एक मसीही व्यक्ति कितनी मात्रा में मदिरा पी सकता है और फिर भी नशे में होने से बच सकता है। वास्तविक प्रश्न यह है कि पवित्रता, स्वतंत्रता, आत्मसंयम, आत्मिक उत्तरदायित्व और दूसरों के प्रति प्रेम के विषय में बाइबल की शिक्षाएँ मसीही जीवन को किस प्रकार दिशा प्रदान करनी चाहिए।

2. बाइबिलीय शब्दावली और दाखमधु की ऐतिहासिक समझ

दाखमधु के संबंध में बाइबल की शिक्षा को सही ढंग से समझने के लिए सबसे पहले पवित्रशास्त्र की मूल भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों का अध्ययन आवश्यक है। आधुनिक पाठक अक्सर यह मान लेते हैं कि अंग्रेजी शब्द Wine का अर्थ हर परिस्थिति में किण्वित मदिरायुक्त पेय ही है। लेकिन प्राचीन शब्दावली और अंगूर से बनाए जाने वाले पेय पदार्थों की प्रकृति अधिक विविध थी। इसलिए प्रत्येक संदर्भ को उसके अपने साहित्यिक और ऐतिहासिक संदर्भ में समझना आवश्यक है।

पुराने नियम में दाखमधु के लिए प्रयुक्त प्रमुख इब्रानी शब्द यायिन (Yayin) है। यह शब्द विशेष रूप से उन संदर्भों में किण्वित दाखमधु को दर्शाता है जहाँ मतवालेपन और उसके परिणामों का वर्णन किया गया है। तीरोश (Tirosh) का अनुवाद सामान्यतः नया दाखमधु किया जाता है। यह शब्द अक्सर कृषि की समृद्धि और परमेश्वर की आशीष के संदर्भ में आता है (व्यव. 7:13; योए. 2:19)। एक अन्य शब्द शेकार (Shekar) है, जिसका अनुवाद सामान्यतः तेज मदिरा या मादक पेय किया जाता है। ऐसे पेय केवल अंगूर से ही नहीं, बल्कि अन्य स्रोतों से भी बनाए जा सकते थे। ये शब्द दर्शाते हैं कि बाइबल के लेखकों के पास विभिन्न प्रकार के अंगूर उत्पादों और नशीले पेय पदार्थों के लिए अलग-अलग शब्दावली थी। फिर भी, इससे यह सिद्ध नहीं होता कि यायिन का अर्थ हमेशा किण्वित दाखमधु ही है या तीरोश का अर्थ हर परिस्थिति में बिना किण्वित अंगूर का रस ही है। प्रत्येक शब्द का अर्थ उसके साहित्यिक और ऐतिहासिक संदर्भ के आधार पर निर्धारित किया जाना चाहिए।

नए नियम में प्रयुक्त यूनानी शब्द ओइनोस (Oinos) के विषय में भी यही सावधानी आवश्यक है। इसका सामान्य अनुवाद दाखमधु किया जाता है। यह शब्द काना के विवाह के वर्णन (यूह. 2:1–11), मतवालेपन के विरुद्ध चेतावनी (इफि. 5:18) और तीमुथियुस को पौलुस के निर्देश (1 तीमु. 5:23) जैसे विभिन्न संदर्भों में आता है। केवल इस शब्द के आधार पर प्रत्येक संदर्भ में पेय के किण्वित होने या उसमें अल्कोहल की मात्रा का निर्धारण नहीं किया जा सकता। इसके अर्थ को समझने के लिए तत्कालीन संदर्भ और ऐतिहासिक परिस्थितियों का अध्ययन आवश्यक है।

बक्कियोकी इस धारणा को उचित रूप से चुनौती देते हैं कि दाखमधु के सभी सकारात्मक उल्लेख अनिवार्य रूप से मदिरायुक्त पेय के विषय में हैं। लेकिन इसके विपरीत यह मान लेना कि सभी सकारात्मक उल्लेख बिना किण्वित अंगूर के रस के विषय में हैं, भी प्रमाण की माँग करता है। सही बाइबिलीय व्याख्या में किसी पूर्वनिर्धारित धर्मवैज्ञानिक निष्कर्ष को सिद्ध करने के लिए शब्दों के अर्थ निर्धारित नहीं किए जाने चाहिए।

बक्कियोकी प्राचीन संसार में अंगूर के रस को सुरक्षित रखने की विधियों पर भी चर्चा करते हैं। एक सामान्य आपत्ति यह उठाई जाती है कि आधुनिक प्रशीतन व्यवस्था के अभाव में प्राचीन लोग बिना किण्वित अंगूर का रस कैसे उपलब्ध रख सकते थे। बक्कियोकी इस प्रश्न का उत्तर देते हुए अंगूर के रस को उबालकर गाढ़ा सिरप बनाने, छानने और ठंडे स्थानों में रखने जैसी प्राचीन संरक्षण विधियों का उल्लेख करते हैं। ये ऐतिहासिक विधियाँ यह दर्शाती हैं कि प्राचीन समाजों में अंगूर से बने उत्पादों को किण्वन से बचाकर सुरक्षित रखने के कुछ तरीके उपलब्ध थे। इसलिए बिना किण्वित अंगूर का रस प्राचीन काल में अज्ञात या आधुनिक आविष्कार नहीं था। फिर भी, इन विधियों का अस्तित्व यह सिद्ध नहीं करता कि बाइबल में दाखमधु के प्रत्येक उल्लेख का अर्थ बिना किण्वित अंगूर का रस ही है। इस ऐतिहासिक प्रमाण का महत्व प्राचीन पेय पदार्थों के विषय में प्रचलित सरल धारणाओं को चुनौती देने में है; इससे आगे के निष्कर्ष केवल इसी आधार पर नहीं निकाले जाने चाहिए।

3. पुराने नियम में दाखमधु: परमेश्वर का प्रावधान, मानवीय उत्तरदायित्व और मतवालेपन का खतरा

दाखमधु के विषय में बाइबल की शिक्षा को समझने में एक महत्वपूर्ण कठिनाई यह है कि इसमें इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार के उल्लेख मिलते हैं। कुछ अंशों में दाखमधु कृषि की समृद्धि और परमेश्वर की आशीष के रूप में प्रस्तुत होता है, जबकि अन्य अंशों में यह छल, विवेक के नाश और नैतिक पतन से जुड़ा हुआ है। इन अलग-अलग विवरणों को उनके अपने साहित्यिक और धर्मवैज्ञानिक संदर्भ में समझना आवश्यक है।

भजन संहिता 104:14–15 में परमेश्वर द्वारा पृथ्वी से मनुष्य के लिए भोजन, तेल और दाखमधु उत्पन्न करने का वर्णन किया गया है। इसी प्रकार, व्यवस्थाविवरण 7:13 में अनाज, नया दाखमधु और तेल को परमेश्वर की वाचा की आशीषों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उत्पत्ति 27:28 और 49:10–12 में भी दाखमधु का उल्लेख आशीष और कृषि की समृद्धि के संदर्भ में मिलता है। ये अंश परमेश्वर की उदारता और उसकी सृष्टि की भलाई का उत्सव मनाते हैं। बक्कियोकी इन सकारात्मक संदर्भों को किण्वित मदिरा के बजाय बिना किण्वित अंगूर के उत्पादों से संबंधित मानते हैं। कुछ संदर्भों में यह व्याख्या संभव हो सकती है, लेकिन यह निष्कर्ष निकालना आवश्यक नहीं है कि दाखमधु के सभी सकारात्मक उल्लेखों का अर्थ बिना किण्वित अंगूर का रस ही है। यहाँ मुख्य धर्मवैज्ञानिक सिद्धांत यह है कि परमेश्वर की सृष्टि में किसी वस्तु की भलाई उसके दुरुपयोग को उचित नहीं ठहराती। परमेश्वर द्वारा दिए गए किसी वरदान का विवेक और आत्मसंयम के बिना उपयोग विनाशकारी बन सकता है।

नीतिवचन की पुस्तक में यह अंतर और भी स्पष्ट दिखाई देता है। नीतिवचन 20:1 कहता है, "दाखमधु ठट्ठा करनेवाला है, और मदिरा हुल्लड़ मचानेवाली है; जो कोई उसके कारण भटकता है, वह बुद्धिमान नहीं।" यह वचन दाखमधु और मदिरा को ऐसे भ्रामक प्रभावों के रूप में प्रस्तुत करता है जो मनुष्य के विवेक को कमजोर कर सकते हैं। यहाँ चिंता केवल मदिरा के शारीरिक प्रभावों तक सीमित नहीं है; मुख्य समस्या बुद्धि और आत्मसंयम का नष्ट होना है। नीतिवचन 23:29–35 इस चेतावनी को विस्तार से प्रस्तुत करता है। इसमें दुःख, झगड़े, घाव, विकृत दृष्टि और बार-बार मदिरा की इच्छा करने की स्थिति का वर्णन मिलता है। यहाँ ऐसे व्यक्ति का चित्रण किया गया है जो मदिरा के विनाशकारी परिणामों का अनुभव करने के बाद भी फिर से पीने की इच्छा करता है। इस प्रकार, बाइबल मदिरा को केवल एक पेय पदार्थ के रूप में नहीं, बल्कि ऐसी संभावित शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है जो मनुष्य को अपना दास बना सकती है और उसे नष्ट कर सकती है।

नीतिवचन 31:4–5 में अधिकार और नेतृत्व के पदों पर बैठे लोगों के लिए एक विशेष चेतावनी दी गई है। राजा और हाकिमों को दाखमधु तथा मदिरा में लिप्त न होने की सलाह दी गई है, ताकि वे पीकर व्यवस्था को न भूलें और पीड़ितों का न्याय न बिगाड़ें। यहाँ मुख्य चिंता नेतृत्व के उत्तरदायित्व की है। जिन लोगों के निर्णय दूसरों के जीवन को प्रभावित करते हैं, उन्हें स्पष्ट विवेक बनाए रखना चाहिए। यद्यपि यह अंश इस्राएल के प्रत्येक व्यक्ति के लिए सार्वभौमिक निषेध नहीं है, फिर भी यह मसीही नेतृत्व के लिए एक महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित करता है: दूसरों के कल्याण के लिए उत्तरदायी लोगों को अनुशासन, सतर्कता और विवेक का प्रदर्शन करना चाहिए।

पुराने नियम में विशेष समर्पण और उत्तरदायित्व से जुड़े मद्यत्याग के उदाहरण भी मिलते हैं। गिनती 6:1–4 में नाजीर की प्रतिज्ञा का वर्णन है। इस प्रतिज्ञा के अंतर्गत व्यक्ति अपने आपको परमेश्वर के लिए अलग करता था और दाखमधु, मदिरा तथा अंगूर की उपज से परहेज करता था। यह संयम केवल मतवालेपन से बचने तक सीमित नहीं था, बल्कि परमेश्वर के प्रति समर्पण का प्रतीक था। इसी प्रकार, लैव्यव्यवस्था 10:8–11 में परमेश्वर हारून और उसके पुत्रों को मिलापवाले तम्बू में प्रवेश करते समय दाखमधु या मदिरा न पीने की आज्ञा देता है, ताकि वे पवित्र और अपवित्र के बीच अंतर कर सकें और इस्राएलियों को परमेश्वर की विधियाँ सिखा सकें। ये प्रतिबंध विशेष प्रतिज्ञा और याजकीय सेवा से संबंधित थे; इन्हें हर व्यक्ति के लिए सार्वभौमिक निषेध में परिवर्तित नहीं किया जाना चाहिए। फिर भी, ये अंश एक महत्वपूर्ण बाइबिलीय सिद्धांत प्रकट करते हैं: विशेष आत्मिक उत्तरदायित्व के लिए अनुशासित जीवन आवश्यक है और मद्यत्याग परमेश्वर के प्रति समर्पण की एक अभिव्यक्ति हो सकता है।

इन सभी पुराने नियम के अंशों को एक साथ देखने पर यह स्पष्ट होता है कि दाखमधु का विषय केवल कृषि की समृद्धि या व्यक्तिगत आनंद तक सीमित नहीं है। पवित्रशास्त्र इस बात को लेकर गंभीर है कि इसका उपयोग मनुष्य की बुद्धि, विवेक, उत्तरदायित्व और आत्मिक अनुशासन को किस प्रकार प्रभावित कर सकता है।

4. यीशु मसीह और मदिरायुक्त दाखमधु का प्रश्न

मदिरापान से संबंधित किसी भी मसीही चर्चा में यीशु मसीह का उदाहरण केंद्रीय स्थान रखता है, क्योंकि विश्वासियों के आचरण का मूल्यांकन अंततः उनके जीवन और शिक्षाओं के प्रकाश में किया जाना चाहिए। नए नियम के कुछ अंशों का उपयोग यह सिद्ध करने के लिए किया जाता है कि यीशु ने मदिरा का समर्थन किया था, जबकि कुछ अन्य लोग इन्हीं अंशों से विपरीत निष्कर्ष निकालते हैं। इसलिए इन अंशों को उनके तत्कालीन संदर्भ और धर्मवैज्ञानिक उद्देश्य के अनुसार समझना आवश्यक है।

काना का विवाह (यूहन्ना 2:1–11) मदिरायुक्त दाखमधु के समर्थन और मद्यत्याग के पक्ष में सबसे अधिक चर्चा किए जाने वाले अंशों में से एक है। जब विवाह में दाखमधु समाप्त हो गया, तब यीशु ने सेवकों को पत्थर के मटकों में पानी भरने के लिए कहा। बाद में उन्होंने उस पानी को दाखमधु में बदल दिया। भोज के प्रधान ने उसे चखकर टिप्पणी की कि अच्छा दाखमधु अंत तक बचाकर रखा गया था। सीमित मदिरापान का समर्थन करने वाले तर्क देते हैं कि यीशु ने मदिरायुक्त दाखमधु बनाया और इस प्रकार दिखाया कि मदिरापान अपने आप में पाप नहीं है। बक्कियोकी इस व्याख्या को चुनौती देते हुए कहते हैं कि यूनानी शब्द ओइनोस अनिवार्य रूप से किण्वित मदिरा को नहीं दर्शाता। वे यह भी प्रश्न उठाते हैं कि "अच्छा दाखमधु" कहने का अर्थ अनिवार्य रूप से अधिक अल्कोहलयुक्त या किण्वित दाखमधु होना क्यों माना जाए।

इस अंश के संबंध में सबसे महत्वपूर्ण व्याख्यात्मक तथ्य यह है कि यूहन्ना दाखमधु के किण्वित होने या न होने के विषय में स्पष्ट जानकारी नहीं देता। इसलिए यह घटना निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं करती कि यीशु ने नशीला पेय बनाया था। उसी प्रकार, केवल इस अंश के आधार पर यह सिद्ध करना भी कठिन है कि वह निश्चित रूप से बिना किण्वित था। इस घटना का मुख्य उद्देश्य मदिरापान के विषय में शिक्षा देना नहीं, बल्कि यीशु की महिमा प्रकट करना है। यूहन्ना स्पष्ट करता है कि यह यीशु के चिन्हों का आरंभ था, जिसके द्वारा उन्होंने अपनी महिमा प्रकट की और उनके चेलों ने उन पर विश्वास किया (यूह. 2:11)। इसलिए इस घटना का मुख्य संदेश यीशु की पहचान और महिमा है, न कि मसीही मदिरापान की किसी परंपरा की स्थापना।

मत्ती 11:18–19 में यीशु के विरुद्ध एक और आरोप का उल्लेख मिलता है। यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला न तो खाता था और न पीता था, फिर भी लोगों ने कहा कि उसमें दुष्टात्मा है। इसके विपरीत, यीशु लोगों के साथ खाते-पीते थे, इसलिए उनके विरोधियों ने उन्हें "खाऊ और पियक्कड़" कहा। कुछ लोग इस अंश को इस बात का प्रमाण मानते हैं कि यीशु मदिरायुक्त दाखमधु पीते थे। लेकिन संदर्भ स्पष्ट करता है कि यीशु अपने आलोचकों की असंगति और पाखंड को उजागर कर रहे थे। उन्होंने यूहन्ना को उसकी तपस्वी जीवनशैली के कारण अस्वीकार किया और यीशु को सामान्य लोगों के साथ मेलजोल रखने के कारण अस्वीकार किया। ये आरोप दोनों की सेवकाई को बदनाम करने के उद्देश्य से लगाए गए थे। इसलिए यीशु को पियक्कड़ कहना उनके वास्तविक आचरण का विश्वसनीय प्रमाण नहीं, बल्कि उनके विरोधियों का शत्रुतापूर्ण आरोप था। विरोधियों के आरोपों के आधार पर यीशु की मदिरापान संबंधी आदतों को स्थापित करना व्याख्यात्मक रूप से उचित नहीं है।

अंतिम भोज भी इस विषय में महत्वपूर्ण है। मत्ती 26:26–29 में यीशु कटोरा लेकर उसे अपनी वाचा के लहू के रूप में पहचान कराते हैं। इसके बाद वे उसमें उपस्थित पदार्थ को "दाखलता का फल" कहते हैं। बक्कियोकी का तर्क है कि यह अभिव्यक्ति बिना किण्वित अंगूर के रस के उपयोग का समर्थन करती है। लेकिन यह अभिव्यक्ति अपने आप में पेय के किण्वित होने या न होने को सिद्ध नहीं करती। इसके लिए फसह का संदर्भ, यहूदी रीति-रिवाज और ऐतिहासिक प्रमाण भी विचार में लेने चाहिए। फिर भी, कटोरे का धर्मवैज्ञानिक महत्व निर्विवाद है: यह वाचा के लहू और मसीह की बलिदानी मृत्यु को दर्शाता है। प्रभु भोज व्यक्तिगत मदिरापान संबंधी पसंदों को उचित ठहराने का अवसर नहीं है। यह मसीह के बलिदान का स्मरण करने और उसके आने तक उसकी मृत्यु का प्रचार करने की कलीसिया की पवित्र विधि है (1 कुरि. 11:26)। इसलिए इसका पालन श्रद्धा, आत्मपरीक्षण, एकता और आत्मिक विवेक के साथ किया जाना चाहिए।

काना की घटना, यीशु के विरुद्ध लगाए गए आरोप और अंतिम भोज का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि इन अंशों से निर्णायक रूप से यह स्थापित नहीं किया जा सकता कि यीशु ने मदिरायुक्त दाखमधु के सेवन का समर्थन किया था। लेकिन इन अंशों से वह निष्कर्ष भी जबरन नहीं निकालना चाहिए जिसे वे स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं करते। प्रमाणों की सीमाओं को स्वीकार करते हुए यीशु की शिक्षाओं और प्रेरितों की व्यापक शिक्षा के संदर्भ में पवित्रता और आत्मसंयम का अध्ययन करना ही उत्तरदायित्वपूर्ण धर्मवैज्ञानिक दृष्टिकोण है।

5. प्रेरितों की शिक्षा: संयम, आत्मसंयम और मसीही चरित्र

नया नियम विश्वासियों के चरित्र पर विशेष बल देता है, विशेषकर इस बात पर कि उन्हें आत्मिक रूप से सतर्क और आत्मसंयमी रहना चाहिए। प्रेरितों की शिक्षा मदिरापान के बाहरी प्रश्न से आगे बढ़कर इस गहरे प्रश्न को संबोधित करती है कि मनुष्य के जीवन को वास्तव में कौन नियंत्रित करता है।

इफिसियों 5:18 मदिरा के विषय में नए नियम के सबसे स्पष्ट अंशों में से एक है: "दाखमधु से मतवाले न बनो, क्योंकि इससे लुचपन होता है, परन्तु आत्मा से परिपूर्ण होते जाओ।" पौलुस यहाँ मतवालेपन और पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होने के बीच स्पष्ट विरोध स्थापित करते हैं। मतवाले न होने की आज्ञा स्पष्ट है। मतवालापन मनुष्य के विवेक और आत्मसंयम को कमजोर करने वाले प्रभाव के अधीन हो जाने को दर्शाता है। इसके विपरीत, आत्मा से परिपूर्ण होना उस जीवन को दर्शाता है जो परमेश्वर की उपस्थिति और प्रभाव के द्वारा नियंत्रित होता है। इसके बाद के पदों में भजन, स्तुति और आत्मिक गीतों के द्वारा एक-दूसरे को प्रोत्साहित करना, धन्यवाद देना और मसीह के भय में एक-दूसरे के अधीन रहना आत्मा से परिपूर्ण समुदाय की विशेषताओं के रूप में प्रस्तुत किया गया है (इफि. 5:19–21)। यद्यपि यह अंश हर प्रकार के मदिरापान को स्पष्ट रूप से निषिद्ध नहीं करता, लेकिन मतवालेपन को स्पष्ट रूप से मना करता है। इसका व्यापक धर्मवैज्ञानिक अर्थ यह है कि विश्वासियों का जीवन पवित्र आत्मा के नियंत्रण में होना चाहिए।

1 थिस्सलुनीकियों 5:6–8 में भी यही बल दिखाई देता है। पौलुस विश्वासियों को सोने के बजाय जागते और सचेत रहने की शिक्षा देते हैं। वे आत्मसंयम को विश्वास, प्रेम और उद्धार की आशा से जोड़ते हैं। इसी प्रकार, पतरस विश्वासियों को सचेत और जागते रहने की आज्ञा देते हैं, क्योंकि उनका विरोधी शैतान गर्जनेवाले सिंह के समान इस खोज में रहता है कि किसे फाड़ खाए (1 पत. 5:8)। ये अंश स्पष्ट करते हैं कि मसीही जीवन में आत्मिक सतर्कता और अनुशासित आचरण आवश्यक हैं। विश्वासियों को अपना नैतिक विवेक खोना या अपनी आत्मिक जिम्मेदारियों के प्रति लापरवाह नहीं होना चाहिए।

कलीसिया के अगुवों की योग्यताएँ इस चर्चा को और भी महत्वपूर्ण बनाती हैं। 1 तीमुथियुस 3:2–3 के अनुसार अध्यक्ष को संयमी, समझदार, आदरणीय और आत्मसंयमी होना चाहिए; उसे मतवालापन का दास नहीं होना चाहिए। इसी प्रकार, तीतुस 1:7–8 में अध्यक्ष के लिए आवश्यक है कि वह निर्दोष हो, घमंडी या शीघ्र क्रोध करनेवाला न हो, पियक्कड़ न हो, बल्कि अतिथि-सत्कार करनेवाला, आत्मसंयमी, न्यायी, पवित्र और अनुशासित हो। 1 तीमुथियुस 3:8 में सेवकों के विषय में कहा गया है कि वे बहुत दाखमधु पीनेवाले न हों। इन अभिव्यक्तियों को लेकर यह चर्चा होती रही है कि क्या सीमित मात्रा में मदिरापान की अनुमति है। फिर भी, इन योग्यताओं का व्यापक अर्थ स्पष्ट है: कलीसियाई नेतृत्व के लिए अनुशासन, सही विवेक और आत्मसंयम से परिपूर्ण जीवन आवश्यक है। कलीसिया में नेतृत्व केवल आत्मिक वरदानों, सार्वजनिक सेवकाई या प्रचार करने की क्षमता का विषय नहीं है; इसके लिए ऐसा जीवन भी आवश्यक है जो सुसमाचार के नैतिक चरित्र को प्रदर्शित करे।

1 तीमुथियुस 5:23 में पौलुस द्वारा तीमुथियुस को दिया गया निर्देश भी सावधानीपूर्वक विचार करने योग्य है: "आगे को केवल पानी ही न पीना, पर अपने पेट के और अपने बार-बार बीमार होने के कारण थोड़ा-थोड़ा दाखमधु भी काम में लाया कर।" इस वचन को अक्सर सीमित मदिरापान की बाइबिलीय अनुमति के रूप में उद्धृत किया जाता है। बक्कियोकी इसके चिकित्सकीय संदर्भ का अध्ययन करते हुए तर्क देते हैं कि इसे सामान्य मदिरापान के समर्थन के रूप में नहीं समझना चाहिए। संदर्भ स्पष्ट करता है कि पौलुस यहाँ तीमुथियुस के स्वास्थ्य की समस्या के विषय में बात कर रहे हैं, न कि पूरी कलीसिया के लिए कोई सामान्य आदत निर्धारित कर रहे हैं। साथ ही, यह वचन स्पष्ट रूप से नहीं बताता कि दाखमधु बिना किण्वित था या उसमें अल्कोहल नहीं था। इसलिए सबसे उचित व्याख्या यह है कि इस निर्देश के चिकित्सकीय उद्देश्य को स्वीकार किया जाए, लेकिन इसे मनोरंजन या सामान्य मदिरापान की असीमित अनुमति में परिवर्तित न किया जाए। किसी विशेष परिस्थिति में दी गई चिकित्सकीय सलाह को सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत नहीं बनाया जा सकता।

इस प्रकार, प्रेरितों की शिक्षा का समग्र संदेश स्पष्ट है: मसीहियों को संयम, आत्मसंयम, आत्मिक सतर्कता और किसी भी प्रकार की दासता से स्वतंत्रता को विकसित करना चाहिए। भले ही प्रत्येक वचन स्पष्ट रूप से पूर्ण मद्यत्याग की आज्ञा न देता हो, फिर भी वे ऐसा धर्मवैज्ञानिक आधार प्रदान करते हैं जिसके अंतर्गत नशीले पदार्थों के सेवन का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

6. मसीही स्वतंत्रता, प्रेम और दासता से मुक्ति

मदिरापान का प्रश्न केवल दाखमधु से संबंधित कुछ विशेष बाइबिलीय अंशों के अध्ययन से पूरी तरह हल नहीं हो सकता। इसे मसीही स्वतंत्रता और दूसरों के प्रति उत्तरदायित्व के विषय में नए नियम की व्यापक शिक्षा के प्रकाश में भी समझना आवश्यक है। रोमियों 14 इस विषय में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। पौलुस यहाँ भोजन और अन्य व्यक्तिगत विवेक से संबंधित विषयों पर विश्वासियों के बीच मौजूद मतभेदों को संबोधित करते हैं। उनकी मुख्य चिंता यह है कि मसीही अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उपयोग करके एक-दूसरे को तुच्छ न समझें, दोषी न ठहराएँ और आत्मिक रूप से हानि न पहुँचाएँ।

रोमियों 14:21 कहता है, "अच्छा तो यह है कि तू न मांस खाए, न दाखमधु पीए, न और कुछ ऐसा करे जिससे तेरा भाई ठोकर खाए।" पौलुस मसीही उत्तरदायित्व की चर्चा में दाखमधु को स्पष्ट रूप से शामिल करते हैं। उनका तर्क यह नहीं है कि प्रत्येक विश्वासी के लिए दाखमधु पीना सार्वभौमिक रूप से निषिद्ध है, बल्कि यह है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रेम के अधीन होना चाहिए। कोई मसीही केवल यह कहकर अपनी व्यक्तिगत आदत को उचित नहीं ठहरा सकता कि पवित्रशास्त्र ने उसे स्पष्ट रूप से निषिद्ध नहीं किया है। उसे यह भी विचार करना चाहिए कि उसकी स्वतंत्रता का उपयोग किसी दूसरे विश्वासी के आत्मिक जीवन को हानि तो नहीं पहुँचा रहा।

1 कुरिन्थियों 8:9 में भी यही सिद्धांत दिखाई देता है। पौलुस विश्वासियों को चेतावनी देते हैं कि उनकी स्वतंत्रता कमजोर विश्वासियों के लिए ठोकर का कारण न बने। मूर्तियों को चढ़ाए गए भोजन के विषय में उनकी शिक्षा एक व्यापक नैतिक सिद्धांत स्थापित करती है: मसीही स्वतंत्रता कभी भी दूसरों के प्रति उत्तरदायित्व से अलग नहीं होती। यदि किसी व्यक्तिगत पसंद का उपयोग दूसरे व्यक्ति के आत्मिक कल्याण के लिए खतरा बनता है, तो विश्वासी को अपनी पसंद छोड़ने के लिए तैयार रहना चाहिए।

उन समाजों में यह सिद्धांत विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जहाँ मदिरा के दुरुपयोग ने अनेक परिवारों, संबंधों और समुदायों को नुकसान पहुँचाया है। ऐसी परिस्थितियों में दूसरों के संघर्षों और कमजोरियों पर विचार किए बिना व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उपयोग करने वाला मसीही व्यक्ति मसीही प्रेम की गहराई को पर्याप्त रूप से नहीं समझ पाया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी दूसरे व्यक्ति की कमजोरी मसीही आचरण के प्रत्येक पहलू को नियंत्रित करे। बल्कि प्रश्न यह है कि क्या विश्वासी दूसरों के आत्मिक कल्याण के लिए अपनी व्यक्तिगत पसंद को सीमित करने और छोड़ने के लिए तैयार है। मसीही परिपक्वता व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकतम उपयोग करने में नहीं, बल्कि प्रेम के कारण उसे उत्तरदायित्वपूर्वक नियंत्रित करने में प्रकट होती है।

1 कुरिन्थियों 6:12 में पौलुस का कथन भी यहाँ महत्वपूर्ण है: "सब वस्तुएँ मेरे लिए उचित तो हैं, परन्तु सब वस्तुएँ लाभ की नहीं; सब वस्तुएँ मेरे लिए उचित हैं, परन्तु मैं किसी बात के अधीन न हूँगा।" पौलुस यहाँ कुरिन्थियों के किसी प्रचलित नारे को उद्धृत कर रहे हैं या अपना स्वयं का सिद्धांत प्रस्तुत कर रहे हैं, इस विषय में चर्चा हो सकती है। लेकिन उनका स्पष्टीकरण स्पष्ट है: मसीही स्वतंत्रता किसी दूसरे प्रभाव की दासता में परिवर्तित नहीं होनी चाहिए। यह सिद्धांत उन पदार्थों के संबंध में विशेष रूप से प्रासंगिक है जो निर्भरता उत्पन्न कर सकते हैं और आत्मसंयम को कमजोर कर सकते हैं। मदिरापान आरंभ में स्वेच्छा से किया जाने वाला कार्य हो सकता है, लेकिन बार-बार सेवन करने से यह निर्भरता में बदल सकता है। धीरे-धीरे व्यक्ति उस स्वतंत्रता को खो सकता है जिसे वह आरंभ में अपने पास होने का दावा करता था। इसलिए विश्वासी को केवल यह नहीं देखना चाहिए कि कोई कार्य स्वीकार्य है या नहीं, बल्कि यह भी विचार करना चाहिए कि कहीं वह उसे अपने वश में तो नहीं कर सकता।

गलातियों 5:13 में भी यही विचार प्रस्तुत किया गया है। पौलुस कहते हैं कि अपनी स्वतंत्रता को शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति का अवसर न बनाकर प्रेम के द्वारा एक-दूसरे की सेवा करने के लिए उपयोग करना चाहिए। मसीही स्वतंत्रता अनियंत्रित व्यक्तिगत अधिकार नहीं है। यह पाप के प्रभुत्व से मुक्ति है, ताकि विश्वासी परमेश्वर और दूसरों की विश्वासयोग्यता से सेवा कर सकें। इसलिए सीमित मदिरापान का समर्थन करने वाला तर्क भी आत्मसंयम, दूसरों की सुरक्षा और सुसमाचार के अनुरूप जीवन जीने के उत्तरदायित्व से अलग नहीं किया जा सकता।

7. मसीही गवाही, पवित्रता और मद्यत्याग का धर्मवैज्ञानिक आधार

इस चर्चा को अंततः व्यक्तिगत नैतिकता से आगे बढ़कर संसार के सामने कलीसिया की गवाही तक पहुँचना चाहिए। मदिरा का दुरुपयोग केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं है। इसके परिणाम पारिवारिक संबंधों, शारीरिक स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिरता, घरेलू हिंसा, सड़क दुर्घटनाओं और समाज के व्यापक कल्याण तक पहुँचते हैं। जब कलीसिया इस विषय पर केवल व्यक्तिगत अनुमति के दृष्टिकोण से चर्चा करती है, तो उसे इन वास्तविकताओं की अनदेखी नहीं करनी चाहिए।

रोमियों 12:1–2 विश्वासियों को अपने शरीरों को जीवित, पवित्र और परमेश्वर को स्वीकार्य बलिदान के रूप में अर्पित करने तथा इस संसार के अनुरूप न बनने, बल्कि मन के नए हो जाने से रूपांतरित होने का आह्वान करता है। मसीही आचरण को सुसमाचार की रूपांतरित करने वाली शक्ति को प्रदर्शित करना चाहिए। शरीर अनियंत्रित व्यक्तिगत आनंद की पूर्ति का साधन नहीं है; वह परमेश्वर का है और उसकी सेवा के लिए समर्पित होना चाहिए। 1 कुरिन्थियों 10:31 जीवन के प्रत्येक क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रस्तुत करता है: "तुम चाहे खाओ, चाहे पीओ, चाहे जो कुछ करो, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिए करो।" मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि किसी विशेष कार्य को किसी एक बाइबिलीय वचन के आधार पर उचित ठहराया जा सकता है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वह परमेश्वर की महिमा करने वाले जीवन में योगदान देता है।

विश्वासी संसार के सामने जो उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, उससे भी उनकी मसीही गवाही प्रभावित होती है। फिलिप्पियों 2:15 में पौलुस विश्वासियों को टेढ़ी और हठीली पीढ़ी के बीच निर्दोष और निष्कपट परमेश्वर की संतान बनकर संसार में ज्योतियों के समान चमकने का आह्वान करते हैं। जिस समाज में मदिरा का दुरुपयोग अनेक लोगों के लिए गंभीर पीड़ा का कारण बनता है, वहाँ मसीही मद्यत्याग करुणा, एकजुटता और उत्तरदायित्वपूर्ण गवाही की सार्थक अभिव्यक्ति बन सकता है। यह दर्शाता है कि मसीही पहचान व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकतम उपयोग करने में नहीं, बल्कि सुसमाचार की रूपांतरित करने वाली शक्ति में आधारित है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण धर्मवैज्ञानिक अंतर बनाए रखना आवश्यक है। बाइबल मतवालेपन को स्पष्ट रूप से निषिद्ध करती है। वह नशीले पेय पदार्थों के भ्रामक प्रभावों के विरुद्ध चेतावनी देती है और आत्मिक अगुवों से अनुकरणीय अनुशासन की अपेक्षा करती है। लेकिन क्या पवित्रशास्त्र मदिरा के प्रत्येक संभावित सेवन को स्पष्ट रूप से सार्वभौमिक रूप से निषिद्ध करता है, यह एक अलग व्याख्यात्मक प्रश्न है। बक्कियोकी तर्क देते हैं कि बाइबल के प्रमाणों को सही ढंग से समझने पर वे पूर्ण मद्यत्याग का समर्थन करते हैं। उनके भाषायी, ऐतिहासिक और धर्मवैज्ञानिक तर्क गंभीरता से विचार करने योग्य हैं, विशेषकर उनकी यह चुनौती कि दाखमधु के सभी बाइबिलीय उल्लेख अनिवार्य रूप से किण्वित मदिरा को ही दर्शाते हैं। फिर भी, मद्यत्याग के पक्ष में तर्क को इस दावे पर आधारित नहीं होना चाहिए कि दाखमधु के प्रत्येक सकारात्मक उल्लेख का अर्थ बिना किण्वित अंगूर का रस ही है। प्रत्येक संदर्भ में ऐसा निष्कर्ष स्थापित नहीं किया जा सकता।

इसके बजाय, पवित्रशास्त्र की समग्र शिक्षा से मद्यत्याग के लिए अधिक व्यापक धर्मवैज्ञानिक आधार प्राप्त होता है। पवित्रता का आह्वान (1 पत. 1:15–16), आत्मा का फल आत्मसंयम (गला. 5:22–23), आत्मिक सतर्कता की आवश्यकता (1 थिस्स. 5:6–8; 1 पत. 5:8), किसी भी वस्तु का दास न बनने की स्वतंत्रता (1 कुरि. 6:12), कमजोर विश्वासियों के प्रति उत्तरदायित्व (रोमि. 14:13–21; 1 कुरि. 8:9–13), और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परमेश्वर की महिमा करने का कर्तव्य (1 कुरि. 10:31)—ये सभी सिद्धांत मिलकर मद्यत्याग को एक उत्तरदायित्वपूर्ण मसीही आचरण के रूप में अपनाने के लिए पर्याप्त आधार प्रदान करते हैं।

कलीसिया के जीवन में यह अंतर विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। मद्यत्याग को एक विवेकपूर्ण, उत्तरदायित्वपूर्ण और आत्मिक रूप से लाभदायक मसीही आचरण के रूप में सिखाना इस दावे के समान नहीं है कि मदिरा का प्रत्येक संभावित सेवन किसी स्पष्ट सार्वभौमिक बाइबिलीय आज्ञा के द्वारा निषिद्ध है। कलीसिया को परमेश्वर के वचन के अधिकार से आगे बढ़कर विश्वासियों के विवेक को बाँधने के बजाय पवित्रशास्त्र के नैतिक सिद्धांतों को दृढ़ता से सिखाना चाहिए। साथ ही, मसीही स्वतंत्रता को शिष्यत्व के व्यापक उत्तरदायित्वों की अनदेखी करने का बहाना भी नहीं बनने देना चाहिए।

8. निष्कर्ष: मसीही परिपक्वता का वास्तविक मापदंड

मदिरायुक्त दाखमधु के विषय में बाइबिलीय चर्चा को इस प्रश्न तक सीमित नहीं किया जा सकता कि एक मसीही व्यक्ति मतवाला हुए बिना कितनी मात्रा में मदिरा पी सकता है। ऐसा दृष्टिकोण मसीही नैतिकता को केवल इस सीमा की खोज तक सीमित कर देता है कि कौन-सा कार्य तकनीकी रूप से स्वीकार्य है और कौन-सा पापपूर्ण। लेकिन पवित्रशास्त्र की अधिक गहरी चिंता ऐसे लोगों का निर्माण करना है जिनका जीवन यीशु मसीह की पवित्रता, बुद्धि, आत्मसंयम और प्रेम को प्रतिबिंबित करे।

पुराना नियम नशीले पेय पदार्थों के भ्रामक और विनाशकारी प्रभावों के विरुद्ध बार-बार चेतावनी देता है। नाजीरों के उदाहरण और याजकों पर लगाए गए प्रतिबंध यह दर्शाते हैं कि मद्यत्याग समर्पण और उत्तरदायित्व की अभिव्यक्ति हो सकता है। यीशु के जीवन से संबंधित विवरण यह निर्णायक रूप से स्थापित नहीं करते कि उन्होंने मदिरायुक्त दाखमधु के सेवन का समर्थन किया था। दूसरी ओर, नए नियम की प्रेरितीय शिक्षाएँ लगातार संयम, आत्मिक सतर्कता, आत्मसंयम और दासता से स्वतंत्रता पर बल देती हैं। नया नियम यह भी स्पष्ट करता है कि मसीही स्वतंत्रता को प्रेम और दूसरों के प्रति उत्तरदायित्व के अधीन रहना चाहिए।

यद्यपि बाइबल प्रत्येक संभावित प्रकार के मदिरापान पर एक स्पष्ट सार्वभौमिक प्रतिबंध घोषित करने के बजाय विशेष रूप से मतवालेपन को निषिद्ध करती है, फिर भी इसकी व्यापक नैतिक शिक्षा विश्वासियों को मद्यत्याग पर गंभीरता से विचार करने के लिए ठोस आधार प्रदान करती है। यह बात विशेष रूप से पास्टरों, प्राचीनों, शिक्षकों और उन सभी लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जिनका आचरण दूसरों के आत्मिक जीवन को प्रभावित करता है। उनकी बुलाहट केवल स्पष्ट पापों से बचने तक सीमित नहीं है; इसमें ऐसा जीवन जीना भी सम्मिलित है जो अनुकरणीय अनुशासन, सही विवेक और आत्मिक परिपक्वता को प्रदर्शित करे।

इसलिए मद्यत्याग को केवल किसी कलीसियाई संप्रदाय के नियम या सांस्कृतिक परंपरा के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए। इसे मसीही अनुशासन, दूसरों के प्रति चिंता और परमेश्वर की महिमा करने वाले जीवन के प्रति प्रतिबद्धता की एक सचेत अभिव्यक्ति के रूप में अपनाया जा सकता है। मसीही व्यक्ति की मुख्य चिंता यह नहीं होनी चाहिए कि वह अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकतम उपयोग किस सीमा तक कर सकता है, बल्कि यह होनी चाहिए कि वह अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को मसीह की प्रभुता के अधीन किस प्रकार ला सकता है।

एक विश्वासी पूछ सकता है, "क्या मदिरा पीना अनिवार्य रूप से पाप है?" लेकिन इससे भी अधिक गहरा प्रश्न यह है, "क्या मेरा निर्णय उस पवित्रता, आत्मसंयम, प्रेम और आत्मिक उत्तरदायित्व को प्रदर्शित करता है जो यीशु मसीह के एक शिष्य में होना चाहिए?" सुसमाचार विश्वासियों को केवल कुछ पापों से दूर रहने के लिए नहीं बुलाता, बल्कि उन्हें ऐसे रूपांतरित लोगों के रूप में जीने के लिए बुलाता है जिनका आचरण उनके प्रभु के चरित्र को प्रतिबिंबित करता है।

अंततः, मसीही परिपक्वता का वास्तविक मापदंड व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सीमा नहीं है, बल्कि यह है कि वह स्वतंत्रता मसीह की प्रभुता और दूसरों की सेवा के लिए किस सीमा तक समर्पित की जाती है।

संदर्भ ग्रंथ सूची

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प्रमुख बाइबिलीय संदर्भ: उत्पत्ति 9:20–27; गिनती 6:1–4; लैव्यव्यवस्था 10:8–11; व्यवस्थाविवरण 7:13; नीतिवचन 20:1; 23:29–35; 31:4–5; भजन संहिता 104:14–15; यूहन्ना 2:1–11; मत्ती 11:18–19; 26:26–29; रोमियों 12:1–2; 14:13–23; 1 कुरिन्थियों 6:12; 8:9–13; 10:31; इफिसियों 5:18–21; गलातियों 5:13, 22–23; फिलिप्पियों 2:15; 1 थिस्सलुनीकियों 5:6–8; 1 तीमुथियुस 3:2–8; 5:23; तीतुस 1:7–8; 1 पतरस 1:15–16; 5:8.

 

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