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फरीसी प्रवृत्ति: यीशु की शिक्षाओं के प्रकाश में धार्मिक पाखंड, आत्मिक अंधापन और अगुवाई की विफलता

फरीसी प्रवृत्ति : यीशु की शिक्षाओं के प्रकाश में धार्मिक पाखंड , आत्मिक अंधापन और अगुवाई की विफलता ( ऐतिहासिक पृष्ठभूमि , बाइबिलीय मूल्यांकन और समकालीन मसीही सेवकों के लिए व्यावहारिक जीवन - शिक्षाएँ ) सारांश पहली शताब्दी के यहूदी धार्मिक जीवन में फरीसियों का महत्वपूर्ण स्थान था । व्यवस्था के प्रति उनकी प्रतिबद्धता , धार्मिक परंपराओं का पालन , शुद्धता संबंधी नियमों पर ध्यान और यहूदी पहचान की रक्षा करने की उनकी इच्छा उस ऐतिहासिक परिस्थिति से जुड़ी थी जिसमें इस्राएल विदेशी शासन और सांस्कृतिक दबावों के बीच वाचा के प्रति अपनी विश्वासयोग्यता बनाए रखने का प्रयास कर रहा था । फिर भी , सुसमाचारों में यीशु और कुछ फरीसियों के बीच शास्त्रों की व्याख्या , धार्मिक अधिकार , शुद्धता , सब्त , दया और सच्ची धार्मिकता को लेकर बार - बार संघर्ष दिखाई देता है । यीशु की कठोर आलोचना धार्मिक अनुशासन या परंपराओं के अस्तित्व के विरुद्ध नहीं थी । उनका विरोध परमेश्वर की आज्ञाओं को विकृत...