पुराने और नए नियम में पापों की क्षमा: ईश्वरीय अनुग्रह, बलिदान के द्वारा प्रायश्चित्त और मसीह में छुटकारे का आधार
पुराने और नए नियम में पापों की क्षमा:
ईश्वरीय अनुग्रह, बलिदान के द्वारा प्रायश्चित्त और मसीह में छुटकारे का आधार
सारांश (Abstract)
पापों की क्षमा बाइबल की एक केंद्रीय शिक्षा है, जो परमेश्वर के स्वभाव, मानवीय पाप की गंभीरता और मेल-मिलाप के लिए परमेश्वर द्वारा किए गए प्रावधान को प्रकट करती है। तथापि, पुराने नियम में पापों की क्षमा और नए नियम में यीशु मसीह के प्रायश्चित्तमय बलिदान के बीच संबंध कई महत्वपूर्ण धर्मवैज्ञानिक प्रश्न उत्पन्न करता है। मूसा की वाचा के अंतर्गत इस्राएलियों के पापों की क्षमा कैसे होती थी? नीनवे के निवासियों को बिना किसी स्पष्ट रूप से वर्णित बलिदान के परमेश्वर की दया कैसे प्राप्त हुई? दाऊद ने अपने पापों को स्वीकार करके पश्चात्ताप किया, तो उसे किस प्रकार क्षमा मिली? जब हिजकिय्याह ने प्रार्थना की और परमेश्वर ने उसकी आयु बढ़ा दी, तो क्या यह पापों की क्षमा प्राप्त करने का कोई दूसरा मार्ग प्रस्तुत करता है? क्या ये घटनाएँ यह सिद्ध करती हैं कि यीशु मसीह की बलिदानी मृत्यु से स्वतंत्र होकर भी पापों की क्षमा प्राप्त की जा सकती है, अथवा इन्हें परमेश्वर की उद्धारकारी योजना के क्रमिक प्रकाशन के संदर्भ में समझा जाना चाहिए?
यह लेख दोनों नियमों में पापों की क्षमा से संबंधित बाइबिलीय धर्मविज्ञान का अध्ययन करता है और यह प्रतिपादित करता है कि पुराना और नया नियम छुटकारे की दो प्रतिस्पर्धी व्यवस्थाएँ प्रस्तुत नहीं करते। यद्यपि विभिन्न ऐतिहासिक और वाचागत परिस्थितियों में पापों की क्षमा का अनुभव किया गया, फिर भी उसका अंतिम उद्धारकारी आधार यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के उद्धारकारी कार्य में निहित है। पुराना नियम परमेश्वर को क्षमा का अनुग्रहकारी स्रोत प्रकट करता है और यह दिखाता है कि परमेश्वर अपनी वाचा की व्यवस्था, बलिदान के द्वारा प्रायश्चित्त, पश्चात्ताप और दया के माध्यम से मनुष्यों के साथ व्यवहार करता है। नया नियम इस सत्य की अधिक पूर्ण प्रेरितीय व्याख्या प्रस्तुत करता है कि मसीह की मृत्यु पापों की क्षमा का निर्णायक उद्धारकारी आधार है, जिसमें पहली वाचा के अंतर्गत किए गए अपराध भी सम्मिलित हैं। लैव्यव्यवस्था की बलिदान-प्रणाली, नीनवे का पश्चात्ताप, दाऊद का पाप-स्वीकार, हिजकिय्याह की प्रार्थना तथा पौलुस और इब्रानियों की पत्री की प्रेरितीय शिक्षाओं का अध्ययन करके यह लेख संपूर्ण बाइबिलीय इतिहास में पापों की क्षमा की निरंतरता और मसीह के प्रायश्चित्तमय कार्य की केंद्रीयता को स्पष्ट करता है।
मुख्य शब्द: पापों की क्षमा, प्रायश्चित्त, बलिदान, पश्चात्ताप, पुराना नियम, नया नियम, ईश्वरीय दया, नीनवे, दाऊद, हिजकिय्याह, यीशु मसीह, छुटकारा।
प्रस्तावना
पापों की क्षमा केवल व्यक्तिगत अपराधबोध को दूर करने से संबंधित कोई धार्मिक अवधारणा नहीं है; यह मूलतः परमेश्वर के स्वभाव, उसकी पवित्रता, मनुष्य के साथ उसकी वाचा के संबंध और उसकी उद्धारकारी योजना से जुड़ी हुई है। संपूर्ण पवित्रशास्त्र में परमेश्वर स्वयं को धर्मी और दयालु दोनों रूपों में प्रकट करता है। वह अपनी पवित्रता से कोई समझौता किए बिना पापी मनुष्यों के साथ मेल-मिलाप का मार्ग अनुग्रहपूर्वक उपलब्ध कराता है। बाइबल निरंतर यह स्थापित करती है कि पापों की क्षमा मानवीय योग्यता से नहीं, बल्कि परमेश्वर के अनुग्रह से उत्पन्न होती है। साथ ही, पवित्रशास्त्र यह भी स्पष्ट करता है कि पाप परमेश्वर की स्थापित व्यवस्था के विरुद्ध गंभीर अपराध है, जिसकी समस्या केवल पछतावे या धार्मिक कर्मकांडों से हल नहीं हो सकती।
जब पुराने नियम में वर्णित क्षमा की घटनाओं की तुलना नए नियम में यीशु मसीह की प्रायश्चित्तमय मृत्यु से संबंधित स्पष्ट शिक्षा के साथ की जाती है, तब एक महत्वपूर्ण धर्मवैज्ञानिक प्रश्न सामने आता है। पुराने नियम में कुछ अवसरों पर पापों की क्षमा निर्धारित बलिदानों और वाचागत व्यवस्थाओं से जुड़ी हुई दिखाई देती है, जबकि अन्य घटनाओं में किसी स्पष्ट बलिदान का उल्लेख किए बिना पश्चात्ताप, पाप-स्वीकार या प्रार्थना के प्रत्युत्तर में परमेश्वर की दया प्रकट होती है। योना की घोषणा के बाद नीनवे के लोगों ने पश्चात्ताप किया और परमेश्वर ने घोषित न्याय को रोक दिया (योना 3:5–10)। दाऊद ने अपना पाप स्वीकार किया और नातान ने उसे बताया कि यहोवा ने उसका पाप दूर कर दिया है (2 शमूएल 12:13; भजन संहिता 51)। जब हिजकिय्याह ने प्राणघातक बीमारी के समय प्रार्थना की, तब परमेश्वर ने उसकी आयु पंद्रह वर्ष और बढ़ा दी (2 राजा 20:1–6; यशायाह 38:1–6)। ये घटनाएँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती हैं: यदि परमेश्वर ने बिना किसी स्पष्ट रूप से वर्णित बलिदान के भी क्षमा और दया प्रदर्शित की, तो नए नियम में पापों की क्षमा का आधार यीशु मसीह की बलिदानी मृत्यु को क्यों बताया गया है?
यह प्रश्न प्रेरितीय घोषणाओं के संदर्भ में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि मसीह के लहू के द्वारा छुटकारा और पापों की क्षमा प्राप्त होती है (इफिसियों 1:7; कुलुस्सियों 1:13–14), उद्धार किसी दूसरे नाम में नहीं है (प्रेरितों के काम 4:12), और परमेश्वर तथा मनुष्यों के बीच एक ही मध्यस्थ है—मनुष्य मसीह यीशु, जिसने अपने आप को सबके लिए छुड़ौती के रूप में दे दिया (1 तीमुथियुस 2:5–6)। सतही अध्ययन से ऐसा प्रतीत हो सकता है कि पुराने नियम में क्षमा प्राप्त करने के कई स्वतंत्र मार्ग थे और नया नियम मसीह को उनमें से एक अतिरिक्त मार्ग के रूप में प्रस्तुत करता है। किंतु ऐसी व्याख्या उन ऐतिहासिक परिस्थितियों को, जिनमें क्षमा का अनुभव किया गया, उस अंतिम उद्धारकारी आधार के साथ भ्रमित करती है जिस पर परमेश्वर की क्षमा स्थापित है। इसलिए इस अध्ययन का केंद्रीय प्रश्न यह नहीं है कि क्या मसीह के देहधारण से पहले परमेश्वर ने लोगों के पाप क्षमा किए थे; पवित्रशास्त्र इसका स्पष्ट उत्तर देता है। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्षमा की वे घटनाएँ मसीह के द्वारा संपन्न किए गए छुटकारे के कार्य से किस प्रकार संबंधित हैं। इसका उत्तर पाने के लिए पुराने नियम को उसके अपने ऐतिहासिक और वाचागत संदर्भ में समझना आवश्यक है, साथ ही प्रेरितीय प्रकाशन की उस पूर्णतर व्याख्या को भी स्वीकार करना आवश्यक है जो परमेश्वर की पूर्वकालीन दया और यीशु मसीह में छुटकारे की निर्णायक सिद्धि के बीच संबंध को स्पष्ट करती है।
परमेश्वर का स्वभाव और पुराने नियम में क्षमा की अवधारणा
पुराना नियम निरंतर परमेश्वर को पापों की क्षमा का स्रोत प्रस्तुत करता है। क्षमा मनुष्य की उपलब्धि से अर्जित कोई वस्तु नहीं, बल्कि परमेश्वर के स्वभाव से उत्पन्न उसके अनुग्रह की अभिव्यक्ति है। निर्गमन 34:6–7 में परमेश्वर मूसा के सामने स्वयं को करुणामय, अनुग्रहकारी, विलंब से क्रोध करने वाला तथा अटल प्रेम और विश्वासयोग्यता से परिपूर्ण बताता है। वह अधर्म, अपराध और पाप को क्षमा करता है। फिर भी वही घोषणा स्पष्ट करती है कि वह दोषी को निर्दोष नहीं ठहराता। ईश्वरीय दया और न्याय का यह संबंध धर्मवैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि क्षमा का अर्थ परमेश्वर की पवित्रता को नकारना या मानवीय पाप को तुच्छ समझना नहीं है।
भजन संहिता और भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकों में यह सत्य और अधिक स्पष्ट होता है। भजन संहिता 103:8–12 परमेश्वर की करुणा का वर्णन करता है और घोषणा करता है कि वह हमारे अपराधों को हमसे उतनी दूर कर देता है जितनी दूर पूर्व से पश्चिम है। भजन संहिता 130:3–4 स्वीकार करता है कि यदि परमेश्वर अधर्म का लेखा रखे, तो कोई भी उसके सामने खड़ा नहीं रह सकता; फिर भी क्षमा उसी के पास है। मीका 7:18–19 भी घोषणा करता है कि परमेश्वर दया करने में प्रसन्न होता है और हमारे पापों को समुद्र की गहराइयों में डाल देता है। ये वचन स्थापित करते हैं कि पापों की क्षमा परमेश्वर के अनुग्रह से उत्पन्न होती है। तथापि, पुराना नियम केवल परमेश्वर की दया की सामान्य घोषणा तक सीमित नहीं रहता। मूसा की वाचा के अंतर्गत परमेश्वर ने प्रायश्चित्त, शुद्धिकरण और वाचागत संबंध की पुनर्स्थापना के लिए बलिदान और धार्मिक विधियों की एक व्यवस्था निर्धारित की। लैव्यव्यवस्था 4–5 में याजकों, पूरी मण्डली, अगुवों और सामान्य इस्राएलियों के विभिन्न पापों के लिए पापबलि से संबंधित विस्तृत निर्देश दिए गए हैं। इन अध्यायों में बार-बार यह घोषणा की जाती है कि निर्धारित बलिदान चढ़ाए जाने के बाद प्रायश्चित्त किया जाएगा और पाप क्षमा किया जाएगा (लैव्यव्यवस्था 4:20, 26, 31, 35; 5:10)। लैव्यव्यवस्था 16 प्रायश्चित्त के दिन का वर्णन करती है, जब महायाजक अपने लिए, इस्राएल की मण्डली के लिए और पवित्रस्थान के लिए प्रायश्चित्त करता था। विशेष रूप से वह बकरा जिसे लोगों के अधर्म का भार लेकर जंगल में भेज दिया जाता था, पापों को दूर किए जाने का प्रतीकात्मक चित्र प्रस्तुत करता है (लैव्यव्यवस्था 16:20–22)। ये व्यवस्थाएँ स्पष्ट करती हैं कि पाप कोई साधारण धार्मिक अनियमितता नहीं था, बल्कि ऐसा गंभीर अपराध था जिसके लिए प्रायश्चित्त और शुद्धिकरण आवश्यक था।
फिर भी यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि इस्राएली यह मानते थे कि पशुबलि की शारीरिक क्रिया अपने आप में क्षमा सुनिश्चित कर देती है, चाहे आराधक के हृदय और जीवन में कोई परिवर्तन हो या न हो। भविष्यद्वक्ताओं ने उन लोगों की कठोर आलोचना की जो अन्याय, उत्पीड़न और विद्रोह में लगे रहने के बावजूद धार्मिक बलिदान चढ़ाते थे। यशायाह 1:11–17 में परमेश्वर उन लोगों को फटकारता है जो धार्मिक विधियाँ तो निभाते हैं, लेकिन धार्मिकता, न्याय और करुणा की उपेक्षा करते हैं। होशे 6:6 घोषणा करता है कि परमेश्वर बलिदान से बढ़कर करुणा और होमबलियों से बढ़कर परमेश्वर के ज्ञान को चाहता है। भविष्यद्वक्ताओं की ये आलोचनाएँ बलिदान की व्यवस्था को समाप्त नहीं करतीं, बल्कि वास्तविक वाचा-निष्ठा से अलग हो चुके कर्मकांडी आराधना के खोखलेपन को उजागर करती हैं।
यही सिद्धांत भजन संहिता 51 में भी दिखाई देता है। दाऊद घोषणा करता है कि परमेश्वर बलिदान को किसी स्वतंत्र धार्मिक लेन-देन के रूप में स्वीकार नहीं करता, बल्कि वह टूटे और पिसे हुए मन को स्वीकार करता है (भजन संहिता 51:16–17)। उल्लेखनीय है कि इसी भजन में आगे धर्म के अनुसार बलिदानों का भी उल्लेख किया गया है (भजन संहिता 51:19)। इससे स्पष्ट होता है कि दाऊद बलिदान को पूरी तरह अस्वीकार नहीं कर रहा था, बल्कि पश्चात्ताप से रहित कर्मकांड को अस्वीकार कर रहा था। इसलिए मूसा की वाचा के अंतर्गत क्षमा को परमेश्वर की दया, बलिदान के द्वारा प्रायश्चित्त, पाप-स्वीकार, पश्चात्ताप, विश्वास और वाचा के प्रति आज्ञाकारिता के पारस्परिक संबंध में समझना चाहिए। भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षाएँ बलिदान की व्यवस्था की सीमाओं की ओर भी संकेत करती हैं और पाप की समस्या के समाधान के लिए परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले एक अधिक पूर्ण प्रावधान की अपेक्षा जगाती हैं। बार-बार चढ़ाए जाने वाले बलिदान मानवीय पाप की समस्या का अंतिम समाधान नहीं कर सकते थे और न ही अपराधबोध को पूरी तरह दूर कर सकते थे। इब्रानियों 10:1–4 स्पष्ट करता है कि व्यवस्था आने वाली अच्छी वस्तुओं की छाया मात्र थी और बैलों तथा बकरों का लहू पापों को अंततः दूर नहीं कर सकता था। इसलिए पुराने नियम की बलिदान-व्यवस्था का महत्व उस महान छुटकारे के प्रकाश में समझा जाना चाहिए जिसकी ओर वह संकेत करती थी।
बलिदान की व्यवस्था से बाहर क्षमा: नीनवे, दाऊद और हिजकिय्याह
योना 3 में नीनवे का वृत्तांत इस बात का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है कि इस्राएल की संस्थागत बलिदान-व्यवस्था के बाहर भी परमेश्वर की दया प्रकट हुई। नीनवे अश्शूर साम्राज्य का एक गैर-यहूदी नगर था और उसके निवासी मूसा की वाचा या लेवीय बलिदान-व्यवस्था के सहभागी नहीं थे। जब योना ने परमेश्वर के आने वाले न्याय की घोषणा की, तब लोगों ने उस चेतावनी पर विश्वास किया, उपवास की घोषणा की और टाट ओढ़कर पश्चात्ताप प्रकट किया (योना 3:5)। राजा ने भी अपने राजसी वस्त्र उतार दिए, टाट पहना और राख में बैठ गया। उसने लोगों को अपने बुरे मार्ग और हिंसा से फिरने का आदेश दिया (योना 3:6–8)। योना 3:10 में इस वृत्तांत का निर्णायक निष्कर्ष मिलता है: परमेश्वर ने उनके कामों को देखा, विशेषकर यह कि वे अपने बुरे मार्ग से फिर गए थे, और उसने वह विपत्ति नहीं भेजी जिसकी घोषणा की थी।
इस वृत्तांत में किसी स्पष्ट बलिदान का उल्लेख न होना पश्चात्ताप और क्षमा के संबंध में एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है। नीनवे में कोई लेवीय याजक-वर्ग नहीं था, न ही मूसा की व्यवस्था के अनुसार बलिदान चढ़ाए गए थे। वे इस्राएल की वाचागत आराधना-व्यवस्था के सहभागी भी नहीं थे। फिर भी परमेश्वर ने उनके पश्चात्ताप का अनुग्रहपूर्वक प्रत्युत्तर दिया। यह घटना दर्शाती है कि ईश्वरीय दया इस्राएल की राष्ट्रीय या धार्मिक विधियों की सीमाओं में बंधी हुई नहीं है। परमेश्वर राष्ट्रों पर भी सार्वभौम है और जो उसके सामने नम्र होते हैं, उन पर वह दया करता है। स्वयं यीशु ने नीनवे के लोगों के पश्चात्ताप का उल्लेख मत्ती 12:41 और लूका 11:32 में किया और उसे उन लोगों के विरुद्ध गवाही के रूप में प्रस्तुत किया जिन्होंने उससे भी बड़े प्रकाशन को अस्वीकार किया। फिर भी योना 3 के धर्मवैज्ञानिक महत्व को उस सीमा से आगे नहीं बढ़ाना चाहिए जो स्वयं पाठ स्थापित करता है। इस वृत्तांत का तत्कालीन विषय नीनवे पर घोषित ऐतिहासिक न्याय है, जिसे लोगों के बदले हुए आचरण के कारण परमेश्वर ने रोक दिया। यह अध्याय प्रत्येक निवासी के अनन्त उद्धार या उनकी व्यक्तिगत क्षमा के अंतिम प्रायश्चित्तमय आधार की व्यवस्थित व्याख्या नहीं करता। इसलिए नीनवे को इस बात के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है कि मसीह के प्रायश्चित्त से स्वतंत्र होकर मनुष्य अंतिम क्षमा प्राप्त कर सकता है। बलिदान का उल्लेख न होना यह सिद्ध करता है कि परमेश्वर मूसा की बलिदान-व्यवस्था के बाहर भी दया कर सकता है; लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं होता कि उसकी क्षमा उसकी व्यापक उद्धारकारी योजना से बाहर कार्य करती है।
दाऊद का अनुभव अधिक प्रत्यक्ष उदाहरण है, क्योंकि पवित्रशास्त्र स्पष्ट रूप से घोषित करता है कि उसका पाप क्षमा किया गया। बतशेबा के साथ व्यभिचार करने और उसके पति ऊरिय्याह की मृत्यु की योजना बनाने के बाद नातान भविष्यद्वक्ता ने दाऊद का सामना किया। दाऊद ने बिना किसी बहाने के स्वीकार किया, "मैं ने यहोवा के विरुद्ध पाप किया है" (2 शमूएल 12:13)। नातान ने तुरंत उत्तर दिया, "यहोवा ने भी तेरा पाप दूर किया है; तू न मरेगा।" इस वृत्तांत में दाऊद द्वारा क्षमा प्राप्त करने से पहले किसी बलिदान को चढ़ाने का उल्लेख नहीं है। इसके बजाय, पाप-स्वीकार और परमेश्वर की अनुग्रहकारी प्रतिक्रिया पर जोर दिया गया है। भजन संहिता 51 दाऊद के पश्चात्ताप की अधिक गहन धर्मवैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। वह अपनी योग्यता पर निर्भर रहने के बजाय परमेश्वर की दया की विनती करता है और उसके अनुग्रह के अनुसार अपने अपराधों को मिटाने की प्रार्थना करता है (भजन संहिता 51:1)। वह अपने पाप की गंभीरता स्वीकार करता है, मानता है कि उसका अपराध मूलतः परमेश्वर के विरुद्ध है और यह समझता है कि परमेश्वर अंतःकरण की सच्चाई चाहता है (भजन संहिता 51:4–6)। उसका भरोसा अपने अपराध की भरपाई करने या धार्मिक कर्मों के द्वारा स्वयं को पुनर्स्थापित करने पर नहीं, बल्कि पूरी तरह परमेश्वर की दया पर है। जब दाऊद कहता है कि परमेश्वर बलिदान से अधिक टूटे और पिसे हुए मन को स्वीकार करता है (भजन संहिता 51:16–17), तो उसका उद्देश्य बलिदान की व्यवस्था को समाप्त करना नहीं, बल्कि पश्चात्ताप से रहित कर्मकांड को अस्वीकार करना है।
नए नियम में दाऊद के अनुभव की व्याख्या करने के लिए रोमियों 4:6–8 विशेष महत्व रखता है। पौलुस भजन संहिता 32:1–2 से उद्धरण देते हुए उस व्यक्ति के धन्य होने की बात करता है जिसके पाप क्षमा किए गए और जिसके अपराध ढाँप दिए गए। पौलुस दाऊद को इस बात के पुराने नियम के साक्षी के रूप में प्रस्तुत करता है कि मनुष्य के कार्यों के बजाय परमेश्वर का अनुग्रहपूर्ण धर्मी ठहराना क्षमा का आधार है। किंतु इस अंश को रोमियों 3:21–26 के व्यापक तर्क के संदर्भ में पढ़ना आवश्यक है। वहाँ पौलुस स्पष्ट करता है कि मनुष्य मसीह यीशु में संपन्न छुटकारे के द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह से सेंतमेंत धर्मी ठहराए जाते हैं। रोमियों 3:25–26 यह भी बताता है कि परमेश्वर ने पहले किए गए पापों के संबंध में अपनी धार्मिकता प्रकट की। इसलिए पौलुस दाऊद का उपयोग मसीह से स्वतंत्र किसी दूसरी क्षमा-व्यवस्था को स्थापित करने के लिए नहीं करता, बल्कि दाऊद का अनुभव उस अनुग्रहपूर्ण धार्मिकता की प्रकृति को प्रमाणित करता है जिसका अंतिम उद्धारकारी आधार यीशु मसीह में मिलता है। दाऊद को क्रूस के संबंध में वैसी ऐतिहासिक और धर्मवैज्ञानिक स्पष्टता प्राप्त नहीं थी जैसी प्रेरितों को थी, लेकिन उसके सीमित ज्ञान का अर्थ यह नहीं है कि उसकी क्षमा परमेश्वर की अंतिम उद्धारकारी योजना से स्वतंत्र थी।
हिजकिय्याह का वृत्तांत एक अलग व्याख्यात्मक दृष्टिकोण की माँग करता है, क्योंकि इस घटना का उपयोग अक्सर ऐसे धर्मवैज्ञानिक निष्कर्ष के लिए किया जाता है जिसे स्वयं पाठ स्पष्ट रूप से प्रस्तुत नहीं करता। 2 राजा 20:1–6 में हिजकिय्याह गंभीर रूप से बीमार पड़ता है। यशायाह उसे मृत्यु के लिए तैयार रहने का संदेश देता है। हिजकिय्याह अपना मुँह दीवार की ओर करके यहोवा से प्रार्थना करता है और उसके सामने अपने विश्वासयोग्य जीवन को स्मरण करता हुआ रोता है। इसके बाद यहोवा यशायाह को वापस भेजकर बताता है कि उसने हिजकिय्याह की प्रार्थना सुन ली है, उसके आँसू देखे हैं और उसकी आयु पंद्रह वर्ष बढ़ा दी जाएगी। यशायाह 38 में भी इसी प्रकार का वृत्तांत मिलता है, जिसमें स्वस्थ होने के बाद हिजकिय्याह की धन्यवादपूर्ण प्रार्थना शामिल है। इन अंशों का मुख्य विषय परमेश्वर की करुणा, प्रार्थना के प्रति उसकी प्रतिक्रिया और जीवन तथा मृत्यु पर उसकी सार्वभौमिक सत्ता है। किंतु इन दोनों अंशों में कहीं भी स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा गया है कि इस प्रार्थना के द्वारा हिजकिय्याह के पाप क्षमा किए गए। इन वृत्तांतों का मुख्य विषय उसकी बीमारी, मृत्यु का संकट और उसके जीवन की अवधि बढ़ाया जाना है। इसलिए शारीरिक चंगाई को स्वतः पापों की क्षमा के बराबर मानना उचित व्याख्या नहीं है।
मरकुस 2:1–12 में यीशु पक्षाघात से पीड़ित व्यक्ति के पापों को क्षमा घोषित करता है और उसके बाद उसे चंगा करता है। चंगाई को वह पाप क्षमा करने के अपने अधिकार का प्रत्यक्ष प्रमाण बनाता है। इसी प्रकार यूहन्ना 9:1–3 में यीशु इस धारणा को अस्वीकार करता है कि प्रत्येक शारीरिक बीमारी किसी विशेष व्यक्तिगत पाप का परिणाम होती है। 2 इतिहास 30:18–20 में हिजकिय्याह उन लोगों के लिए मध्यस्थता करता है जिन्होंने फसह में भाग लेने से पहले स्वयं को विधिपूर्वक शुद्ध नहीं किया था। परमेश्वर उसकी प्रार्थना सुनता है और लोगों को चंगा करता है। यह घटना मध्यस्थता की प्रार्थना के प्रति परमेश्वर की दया को दर्शाती है, लेकिन यह सामान्य सिद्धांत स्थापित नहीं करती कि शारीरिक चंगाई और अनन्तकालीन पाप-क्षमा एक ही बात हैं। इसलिए हिजकिय्याह के अनुभव को प्रायश्चित्त का कोई स्वतंत्र मार्ग मानने के बजाय प्रार्थना और मानवीय दुर्बलता के प्रति परमेश्वर की अनुग्रहकारी प्रतिक्रिया के उदाहरण के रूप में समझना चाहिए।
ये तीनों घटनाएँ पापी मनुष्यों के साथ परमेश्वर के व्यवहार के अलग-अलग पहलुओं को प्रकट करती हैं। नीनवे यह दिखाता है कि परमेश्वर इस्राएल की बलिदान-व्यवस्था से बाहर रहने वाले पश्चात्तापी गैर-यहूदी समुदाय पर भी दया कर सकता है। दाऊद का अनुभव स्पष्ट करता है कि सच्चा पश्चात्ताप और पाप-स्वीकार परमेश्वर के अनुग्रह पर निर्भर रहने की आवश्यक प्रतिक्रियाएँ हैं। हिजकिय्याह का अनुभव प्रार्थना के प्रति परमेश्वर की करुणामय प्रतिक्रिया और शारीरिक चंगाई को दर्शाता है, यद्यपि वह स्पष्ट रूप से पापों की क्षमा की घोषणा नहीं है। इन घटनाओं में अंतर होने के बावजूद इनमें से कोई भी मसीह के प्रायश्चित्तमय कार्य से स्वतंत्र छुटकारे की व्यवस्था स्थापित नहीं करती।
दोनों वाचाओं के अंतर्गत क्षमा के लिए मसीह की मृत्यु का उद्धारकारी महत्व
मसीह के देहधारण से पहले प्राप्त क्षमा और उसके प्रायश्चित्तमय कार्य के बीच संबंध की निर्णायक धर्मवैज्ञानिक व्याख्या नए नियम में, विशेषकर रोमियों 3:21–26 और इब्रानियों 9:15 में मिलती है। पौलुस स्पष्ट करता है कि परमेश्वर की धार्मिकता व्यवस्था से अलग प्रकट हुई है, यद्यपि व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता उसकी गवाही देते हैं। यह धार्मिकता यीशु मसीह में विश्वास के द्वारा प्राप्त होती है और विश्वासी मसीह यीशु में संपन्न छुटकारे के कारण परमेश्वर के अनुग्रह से सेंतमेंत धर्मी ठहराए जाते हैं। रोमियों 3:25–26 विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। पौलुस बताता है कि परमेश्वर ने मसीह को उसके लहू के द्वारा, विश्वास से प्राप्त होने वाले प्रायश्चित्त के रूप में प्रस्तुत किया, ताकि पहले किए गए पापों के प्रति अपनी सहनशीलता में वह अपनी धार्मिकता प्रकट करे। यह अंश एक मूलभूत धर्मवैज्ञानिक प्रश्न का उत्तर देता है: परमेश्वर पापियों को क्षमा करते हुए भी धर्मी कैसे बना रहता है? पौलुस का उत्तर है कि मसीह का छुटकारे का कार्य परमेश्वर की धार्मिकता को प्रकट करता है और विश्वास करने वालों को धर्मी ठहराने का न्यायसंगत आधार स्थापित करता है।
इब्रानियों 9:15 पहली वाचा के अंतर्गत किए गए अपराधों और मसीह की मृत्यु के बीच और भी स्पष्ट संबंध स्थापित करता है। लेखक यीशु को नई वाचा का मध्यस्थ बताता है और समझाता है कि उसकी मृत्यु पहली वाचा के अंतर्गत किए गए अपराधों से छुटकारा दिलाती है, ताकि बुलाए गए लोग अनन्त मीरास की प्रतिज्ञा प्राप्त करें। यह वचन अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह स्थापित करता है कि मसीह का छुटकारे का कार्य केवल उन लोगों तक सीमित नहीं है जो उसके देहधारण के बाद जीवित रहे। उसकी मृत्यु पापी मनुष्यों के साथ परमेश्वर के व्यवहार के संपूर्ण इतिहास के लिए उद्धारकारी महत्व रखती है। पुराने नियम के विश्वासियों द्वारा अनुभव की गई क्षमा वास्तविक थी, किंतु उसका अंतिम उद्धारकारी आधार मसीह के बलिदान के प्रकाश में समझा जाना चाहिए। इब्रानियों 10:1–14 लेवीय याजकों के बार-बार चढ़ाए जाने वाले बलिदानों और यीशु मसीह के एक ही बार किए गए बलिदान के बीच तुलना प्रस्तुत करता है। व्यवस्था आने वाली अच्छी वस्तुओं की छाया मात्र थी, और पशुओं का लहू पापों को अंततः दूर नहीं कर सकता था। इसके विपरीत, मसीह ने अपने आप को एक ही बार सदा के लिए अर्पित किया और वह कार्य पूरा किया जिसे बार-बार चढ़ाए जाने वाले बलिदान अंतिम रूप से पूरा नहीं कर सकते थे। इसलिए मूसा की बलिदान-व्यवस्था उद्धार की कोई स्वतंत्र व्यवस्था नहीं थी जिसे बाद में मसीह ने बदल दिया। वह परमेश्वर की क्रमिक उद्धारकारी योजना का हिस्सा थी और मसीह के द्वारा संपन्न होने वाले निर्णायक प्रायश्चित्त की ओर संकेत करती थी।
यह समझ हमें यह भी बताती है कि पुराने नियम के विश्वासियों के लिए मसीह के देहधारण, क्रूस और पुनरुत्थान के संबंध में वही ऐतिहासिक और धर्मवैज्ञानिक ज्ञान होना आवश्यक नहीं था जो प्रेरितों को प्राप्त हुआ। अब्राहम ने परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर विश्वास किया और उसका विश्वास उसके लिए धार्मिकता गिना गया (उत्पत्ति 15:6; रोमियों 4:3)। दाऊद ने परमेश्वर की दया के द्वारा पापों की क्षमा का आनंद मनाया (भजन संहिता 32:1–2; रोमियों 4:6–8)। भविष्यद्वक्ताओं ने उस दुःख उठाने वाले सेवक की भविष्यवाणी की जो बहुतों के पापों का भार उठाएगा (यशायाह 53:4–12)। उनका विश्वास और ज्ञान उस प्रकाशन के अनुसार था जिसे परमेश्वर ने उनके समय में उपलब्ध कराया था। किंतु नया नियम स्पष्ट करता है कि परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ मसीह में पूरी हुईं। इसलिए क्रमिक प्रकाशन का अर्थ यह नहीं है कि छुटकारे के अनेक स्वतंत्र मार्ग थे। इसका अर्थ है कि इतिहास के दौरान परमेश्वर की एक ही उद्धारकारी योजना धीरे-धीरे अधिक स्पष्ट होती गई और यीशु मसीह में निर्णायक रूप से पूरी हुई।
पिता, पुत्र और क्षमा के संबंध में प्रेरितीय शिक्षा
पिता और पुत्र के बीच संबंध इस चर्चा का एक और महत्वपूर्ण पहलू है। यह कहना पूर्णतः सही है कि पापों को क्षमा करने वाला परमेश्वर पिता है, क्योंकि पवित्रशास्त्र क्षमा को परमेश्वर के अनुग्रहकारी स्वभाव की अभिव्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है। किंतु इस सत्य को पुत्र की मध्यस्थता और उसके बलिदानी छुटकारे के कार्य से अलग नहीं किया जाना चाहिए। नया नियम पिता और पुत्र को क्षमा के दो प्रतिस्पर्धी स्रोतों के रूप में प्रस्तुत नहीं करता। इसके विपरीत, वह परमेश्वर की एक ही उद्धारकारी योजना में उनके संयुक्त कार्य को प्रकट करता है। पिता ने पुत्र को संसार में भेजा (यूहन्ना 3:16–17), पुत्र ने मानवता के छुटकारे के लिए स्वेच्छा से अपने आप को दे दिया (गलातियों 1:4; इफिसियों 5:2), और परमेश्वर मसीह के द्वारा मनुष्यों को अपने साथ मेल-मिलाप में लाता है (2 कुरिन्थियों 5:18–19)।
1 तीमुथियुस 2:5–6 घोषणा करता है कि परमेश्वर एक ही है और परमेश्वर तथा मनुष्यों के बीच मध्यस्थ भी एक ही है—मनुष्य मसीह यीशु, जिसने अपने आप को सबके लिए छुड़ौती के रूप में दे दिया। इफिसियों 1:7 स्पष्ट करता है कि मसीह के लहू के द्वारा हमें छुटकारा और पापों की क्षमा प्राप्त होती है, जबकि कुलुस्सियों 1:13–14 अंधकार के अधिकार से छुटकारे, पुत्र में छुटकारे और पापों की क्षमा को आपस में जोड़ता है। ये वचन पिता के क्षमा करने के अधिकार को नकारते नहीं हैं; वे यह स्पष्ट करते हैं कि उसकी उद्धारकारी योजना किस प्रकार पूरी होती है। यूहन्ना 14:6 में यीशु घोषणा करता है कि उसके बिना कोई पिता के पास नहीं आ सकता। इसी प्रकार प्रेरितों के काम 4:12 घोषित करता है कि किसी दूसरे में उद्धार नहीं है और प्रेरितों के काम 10:43 गवाही देता है कि जो कोई यीशु पर विश्वास करता है, उसे उसके नाम के द्वारा पापों की क्षमा प्राप्त होती है। इसलिए क्षमा के स्रोत और उसके उद्धारकारी आधार के बीच अंतर को समझना आवश्यक है। उद्धारकारी योजना का स्रोत पिता है; पुत्र वह मध्यस्थ है जो अपनी बलिदानी मृत्यु के द्वारा छुटकारा संपन्न करता है; और पवित्र आत्मा विश्वासियों के जीवन में परमेश्वर के उद्धारकारी कार्य को लागू करता है (इफिसियों 1:13–14; तीतुस 3:4–7)। यह प्रतिस्पर्धी उद्धारकारी कार्यों का विभाजन नहीं, बल्कि त्रिएक परमेश्वर का एकीकृत कार्य है। इसलिए पिता की क्षमा को स्वीकार करना मसीह की अनिवार्यता को कम नहीं करता और मसीह की मध्यस्थता को स्वीकार करना पिता के अनुग्रहकारी कार्य को नकारता नहीं है। नया नियम स्पष्ट करता है कि क्षमा परमेश्वर का अनुग्रहकारी वरदान है, जिसे पुत्र के द्वारा संपन्न किया जाता है।
पश्चात्ताप, विश्वास और क्षमा का उद्धारकारी आधार
एक और महत्वपूर्ण अंतर उस आधार के बीच है जिस पर क्षमा प्रदान की जाती है और उस प्रतिक्रिया के बीच जिसके द्वारा मनुष्य इसे ग्रहण करता है। पश्चात्ताप, पाप-स्वीकार, प्रार्थना और विश्वास संपूर्ण पवित्रशास्त्र में महत्वपूर्ण हैं, किंतु वे प्रायश्चित्त के वैकल्पिक साधन नहीं हैं। वे उस पापी की उचित प्रतिक्रियाएँ हैं जो अपने अपराध को स्वीकार करके परमेश्वर की दया पर निर्भर रहता है। दाऊद का पाप-स्वीकार, नीनवे का पश्चात्ताप और इस्राएल को बार-बार यहोवा की ओर लौटने का आह्वान इस सिद्धांत को पुराने नियम में स्पष्ट करते हैं (भजन संहिता 51; योना 3:5–10; यशायाह 55:6–7; यहेजकेल 18:30–32)। नए नियम में भी यही शिक्षा जारी रहती है। यीशु लोगों को पश्चात्ताप करने और सुसमाचार पर विश्वास करने के लिए बुलाता है (मरकुस 1:15)। पतरस पापों की क्षमा के संबंध में पश्चात्ताप का प्रचार करता है (प्रेरितों के काम 2:38), और पौलुस परमेश्वर की ओर मन फिराने तथा प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करने को अपनी सेवकाई का केंद्रीय विषय बताता है (प्रेरितों के काम 20:21)।
दोनों नियमों में पश्चात्ताप और विश्वास की निरंतरता का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य का पश्चात्ताप स्वयं प्रायश्चित्त करता है। पाप स्वीकार करना अपने आप अपराधबोध को दूर नहीं करता, प्रार्थना किसी वैकल्पिक बलिदान में परिवर्तित नहीं होती और धार्मिक विधियाँ पाप के बदले कोई प्रतिपूर्ति नहीं कर सकतीं। इसके बजाय, ये सभी परमेश्वर की दया पर निर्भरता की अभिव्यक्तियाँ हैं। पश्चात्ताप करने वाला व्यक्ति पाप के बदले कोई वैकल्पिक मूल्य नहीं चुका रहा होता, बल्कि यह स्वीकार कर रहा होता है कि उसे परमेश्वर के अनुग्रह की आवश्यकता है। इसी प्रकार, यह तथ्य कि परमेश्वर ने किसी स्पष्ट पशुबलि के बिना प्रार्थना या पश्चात्ताप का उत्तर दिया, यह सिद्ध नहीं करता कि उसकी क्षमा अंतिम उद्धारकारी प्रावधान से बाहर कार्य करती है। इस सत्य को तीन परस्पर संबंधित धर्मवैज्ञानिक घोषणाओं में संक्षेपित किया जा सकता है: परमेश्वर का अनुग्रह और दया पापों की क्षमा का स्रोत है; यीशु मसीह अपनी बलिदानी मृत्यु के द्वारा छुटकारा संपन्न करने वाला मध्यस्थ है; और पश्चात्ताप तथा विश्वास परमेश्वर के अनुग्रहकारी प्रावधान के प्रति मनुष्य की उचित प्रतिक्रियाएँ हैं। इन अलग-अलग पहलुओं को एक-दूसरे के साथ भ्रमित करने से या तो पिता और पुत्र के बीच अनुचित विभाजन उत्पन्न होता है, या यह गलत निष्कर्ष निकलता है कि इतिहास में परमेश्वर के प्रति दिखाई गई अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ छुटकारे के स्वतंत्र मार्ग हैं।
निष्कर्ष
पापों की क्षमा के बाइबिलीय धर्मविज्ञान को पुराने नियम की अलग-अलग घटनाओं को पवित्रशास्त्र के व्यापक इतिहास से अलग करके ठीक प्रकार से नहीं समझा जा सकता। इस्राएल, नीनवे, दाऊद और हिजकिय्याह के अनुभव परमेश्वर की दया की अलग-अलग ऐतिहासिक अभिव्यक्तियाँ हैं, किंतु उन्हें उसकी व्यापक उद्धारकारी योजना के संदर्भ में समझना आवश्यक है। मूसा की वाचा के अंतर्गत इस्राएल ने बलिदान के द्वारा प्रायश्चित्त, पाप-स्वीकार, पश्चात्ताप और वाचा के प्रति विश्वासयोग्यता की एकीकृत व्यवस्था में क्षमा प्राप्त की। नीनवे के लोगों ने परमेश्वर की चेतावनी के प्रति पश्चात्तापपूर्ण प्रतिक्रिया दी और परमेश्वर ने दया दिखाई, यद्यपि उस वृत्तांत का मुख्य विषय घोषित ऐतिहासिक न्याय का रोका जाना है, न कि प्रत्येक व्यक्ति के अनन्त उद्धार का आधार। दाऊद ने पाप-स्वीकार और पश्चात्ताप के बाद स्पष्ट रूप से क्षमा प्राप्त की, जिससे यह सिद्ध होता है कि परमेश्वर के अनुग्रह को केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं किया जा सकता। हिजकिय्याह ने प्रार्थना के द्वारा परमेश्वर की दया, चंगाई और जीवन की अवधि बढ़ाए जाने का अनुभव किया, यद्यपि संबंधित अंश इस अनुभव को स्पष्ट रूप से उसके पापों की क्षमा नहीं बताते। ये घटनाएँ परमेश्वर की दया की व्यापकता को प्रकट करती हैं, लेकिन उसकी उद्धारकारी योजना से स्वतंत्र छुटकारे की व्यवस्थाएँ स्थापित नहीं करतीं।
नया नियम मसीह की प्रायश्चित्तमय मृत्यु के संबंध में प्रेरितीय शिक्षा के द्वारा इस विषय की निर्णायक धर्मवैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। रोमियों 3:25–26 परमेश्वर के पूर्वकालीन धैर्य को मसीह के द्वारा प्रकट की गई उसकी धार्मिकता से जोड़ता है, जबकि इब्रानियों 9:15 स्पष्ट रूप से घोषणा करता है कि मसीह की मृत्यु पहली वाचा के अंतर्गत किए गए अपराधों से भी छुटकारा दिलाती है। ये वचन स्थापित करते हैं कि यीशु की मृत्यु केवल उन लोगों के लिए प्रासंगिक नहीं है जो उसके देहधारण के बाद जीवित रहे; वह इतिहास में पापी मनुष्यों के साथ परमेश्वर के संपूर्ण व्यवहार की उद्धारकारी योजना के केंद्र में है। क्रूस पापों की क्षमा के लिए कोई असंबद्ध नया मार्ग प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि वह उस निर्णायक ईश्वरीय प्रावधान को प्रकट करता और पूरा करता है जिसकी ओर संपूर्ण बाइबिलीय इतिहास संकेत करता है। यह सत्य है कि पिता ही पापों को क्षमा करता है, किंतु नया नियम यह प्रकट करता है कि वह पुत्र के द्वारा मेल-मिलाप संपन्न करता है और पुत्र की बलिदानी मृत्यु पापों की क्षमा का निर्णायक उद्धारकारी आधार है। इसलिए पिता के अनुग्रहकारी कार्य और पुत्र की मध्यस्थता को परमेश्वर की एक ही उद्धारकारी योजना के भाग के रूप में समझना चाहिए। इसी प्रकार पश्चात्ताप, पाप-स्वीकार, प्रार्थना और विश्वास प्रायश्चित्त के वैकल्पिक मार्ग नहीं, बल्कि परमेश्वर के अनुग्रह के प्रति पापी मनुष्य की प्रतिक्रियाएँ हैं। ऐतिहासिक परिस्थितियाँ अलग-अलग हो सकती हैं और मसीह से पहले रहने वाले लोगों को प्राप्त प्रकाशन का स्तर प्रेरितीय कलीसिया को प्राप्त प्रकाशन के समान नहीं था। फिर भी, ये भिन्नताएँ छुटकारे के अनेक स्वतंत्र आधारों को स्थापित नहीं करतीं।
अंततः पुराने और नए नियम के बीच निरंतरता एक ही परमेश्वर, मानवीय पाप की स्थायी वास्तविकता, ईश्वरीय दया की आवश्यकता और परमेश्वर की एक ही उद्धारकारी योजना में निहित है। पुराना नियम वाचा, बलिदान, पश्चात्ताप और दया के माध्यम से मनुष्यों के साथ परमेश्वर के व्यवहार को प्रकट करता है, जबकि नया नियम यीशु मसीह में उस छुटकारे की निर्णायक सिद्धि की घोषणा करता है। पुराने नियम के विश्वासियों द्वारा अनुभव की गई क्षमा वास्तविक थी, किंतु उसका अंतिम उद्धारकारी आधार मसीह के प्रायश्चित्तमय कार्य के प्रकाश में समझा जाना चाहिए। इसलिए मूल धर्मवैज्ञानिक निष्कर्ष यह है कि परमेश्वर हमेशा से पापों की क्षमा का स्रोत रहा है, जबकि यीशु मसीह वह निर्णायक मध्यस्थ है जिसके द्वारा परमेश्वर की उद्धारकारी योजना पूरी होती है। ईश्वरीय दया की ऐतिहासिक अभिव्यक्तियाँ अलग-अलग हो सकती हैं, किंतु मसीह के द्वारा परमेश्वर के उद्धारकारी कार्य से स्वतंत्र कोई दूसरा छुटकारे का आधार नहीं है। इसलिए निर्णायक प्रश्न यह नहीं है कि ऐतिहासिक क्रूस की घटना से पहले परमेश्वर ने दाऊद को क्षमा किया था या नहीं, नीनवे पर दया दिखाई थी या नहीं, अथवा हिजकिय्याह की प्रार्थना का उत्तर दिया था या नहीं। पवित्रशास्त्र इन घटनाओं की पुष्टि करता है। वास्तविक और गहरा प्रश्न यह है कि क्या इन ईश्वरीय दया की घटनाओं को उस उद्धारकारी उद्देश्य से अलग किया जा सकता है जिसे परमेश्वर ने अंततः अपने पुत्र के द्वारा पूरा किया। प्रेरितीय गवाही हमें एक ही उत्तर की ओर निर्देशित करती है: पापी मानवता को छुड़ाने और अपने साथ मेल-मिलाप कराने की परमेश्वर की योजना के केंद्र में मसीह का क्रूस है।
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